ताराचंडी धाम : यहीं गिरा था सती का दाहिना नेत्र

रोहतास। 51 शक्तिपीठों में से एक मां ताराचंडी मंदिर सासाराम से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर कैमूर पहाड़ी की गुफा में स्थित है। मनमोहक प्राकृतिक ²श्यों से भरपूर इस मंदिर के पास पहाड़, झरने व अन्य जल स्त्रोत हैं। इस पीठ के बारे में किवदंती है कि सती के तीन नेत्रों में से श्री विष्णु के चक्र से खंडित होकर दायां नेत्र यहीं पर गिरा था, जो तारा शक्तिपीठ के नाम से विख्यात हुआ।मंदिर की प्राचीनता के बारे में कोई ठोस साक्ष्य लिखित रूप से नहीं है। लेकिन मंदिर में स्थित शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि 11वीं सदी में भी यह देश के ख्यात शक्ति स्थलों में से एक था। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इस पीठ का नाम तारा रखा था। दरअसल यहीं पर परशुराम ने मां तारा की उपासना की थी। मां तारा इस शक्तिपीठ में बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं और यहीं पर चंड का वध कर चंडी कहलाई थी। इस धाम पर वर्ष भर में तीन बार मेला लगता है। जहां हजारों श्रद्धालु मां का दर्शन पूजन कर मन्नते मांगते हैं। यहां मन्नतें पूरा होने पर अखंड दीप जलाया जाता है। मंदिर के गर्भगृह के समीप संवत 1229 का खरवार वंशीय राजा प्रताप धवल देव द्वारा ब्राह्मी लिपि में लिखवाया गया शिलालेख भी है, जो मंदिर की ख्याति व प्राचीनता को दर्शाता है।

पुराणों, तंत्र शास्त्रों व प्रतिमा विज्ञान में मां तारा व चंडी का जैसा रूप वर्णित है, उसी अनुसार सासाराम में दस महाविद्याओं में दूसरी मां तारा अवस्थित हैं। मां तारा की प्रतिमा प्रत्यालीढ़ मुद्रा में, बायां पैर आगे शव पर आरूढ़ है। कद में अपेक्षाकृत नाटी हैं, लंबोदर हैं व उनका वर्ण नील है। देवी के चार हाथ हैं। दाहिने हाथ में खड्ग व कैंची है। जबकि बाएं में मुंड व कमल है। कटि में व्याघ्रचर्म लिपटा है। मां तारा की मूर्ति कैमूर पहाड़ी की प्राकृतिक गुफा में अवस्थित है, जो पत्थर पर उत्कीर्ण है। गुफा के बाहर आधुनिक काल में मंदिर का स्वरूप दिया गया है। गुफा की ऊंचाई लगभग चार फीट है। गुफा के अंदर व बाहर की मूर्तियां पूर्व मध्यकालीन हैं। कहते हैं मंदिर के सचिव :

यह धाम 51 शक्तिपीठों में से एक है। मंदिर का इतहिास अत्यंत प्राचीन है। यहीं सती का दाहिना नेत्र गिरा था। धाम पर शारदीय व चैत्र नवरात्र के अलावे सावन महीने में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। सावन महीने में यहां एक महीने का भव्य मेला भी लगता है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन स्थानीय लोग देवी को शहर की कुलदेवी मान चुनरी कढ़ैया के साथ काफी संख्या में प्रसाद चढ़ाने धाम पर पहुंचते हैं। हाथी-घोड़ा व बैंडबाजे के साथ शोभायात्रा भी निकाली जाती है। शारदीय नवरात्र में लगभग दो लाख श्रद्धालु मां का दर्शन-पूजन करने पहुंचते हैं।

महेंद्र साहू, सचिव

मां ताराचंडी कमेटी

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